शनिवार, ११ जून, २०११

KAY MAANGU ZINDGI...........!


लावारिस आवारा सी लगती है तू
छम छम मटकती कहा चलती है तू
मनचली दीवानी सी
 
पगली बेगानी सी
केसुओ से नज़रे छुपाए
किस से बचती है तू
कब रोती है
कब हँसती है
कई राज़ है सीने मे
सजदे जो करती है तू
तेरी आश्की मे
ऐसी खो ना जाउ
खुद को भी मैं समझ न पाउ
मंन मदहोश करती है तू
यह रंग कैसे रचती है तू
समझ न पाया कोई
तो कैसे जानू मैं
मोहरा हूँ तेरे हाथ का
ए ज़िंदगी और क्या चाहती है तू
................!

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