बुधवार, ११ जानेवारी, २०१२

तुम ज़िदगी ना सही


तुम ज़िदगी ना सही
दोस्त बनकर तो ज़िदगी मे आओ
तुम हसी ना सही
मुसकान बनकर तो ज़िदगी मे आओ।
तुम हकीकत ना सही
खयाल बनकर तो ज़िदगी मे आओ
तुम नज़र ना सही
याद बनकर तो ज़िदगी मे आओ।
तुम दिल ना सही
धड़कन बनकर तो ज़िदगी मे आओ
तुम गज़ल ना सही
सायरी बनकर तो ज़िदगी मे आओ।
तुम खुशिया ना सही
गम बनकर तो ज़िदगी मे आओ
तुम पास ना सही
एहसस बनकर तो ज़िदगी मे आओ।
तुम कल ना सही
आज बनकर तो ज़िदगी मे आओ
तुम ज़िदगी ना सही
दोस्त बनकर तो ज़िदगी मे आओ...

मैंने देखा है


मैंने देखा है करवट बदलते हुए बादलों को..........

बारिश मै भीगते हुए आसमा को...

मैंने देखा है हवा के झोके से पेड़ों की डॉलियो को आपस मै सिमटते हुए....

मैंने देखा है पंछीयों को अपनी दिशा बदलते हुए.....

मैंने देखा है इस रिम् झिम मै भिग्ते हुए खुद के बदन को.....

मैंने देखा है बाद्लो के पीछे से झाकते हुए चांद को.......

मैंने महसूस की है तेरी खुश्बो इस बहती हुई हवा में......

मैंने एह्सास किया है तुझे हर पल इस बदलते हुए मौसम मै......